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परिचय

‘हिन्दुस्तानी’ शब्द जिसके मूल मे हमारी भाषा रही है, जिसे हम राष्ट्रभाषा का स्वरूप देना चाहते थे, ईसा की सोलहवीं शताब्दी से ही इसका प्रयास हो रहा था। स्वदेशी रूप में ‘हिन्दुस्तानी’ नाम के स्वरूप में, जिसे सत्रहवीं शताब्दी से प्रयोग में लाने का प्रयास हुआ इसका प्रमाण है कैसरबाग, लखनऊ में अमीरूदौला प्राॅविंशियल लाइब्रेरी नामक पुस्तकालय मे रखी देवनागरी लिपि की विशाल हस्तलिपि जिसकी प्राप्ति से हिन्दुस्तानी का सही आकार स्पष्ट होता है यद्यपि जिसकी प्राप्ति अत्यन्त प्राचीन प्रतीत होती है, किन्तु इसमें स्पष्ट निर्देश है कि ये हिन्दुस्तानी में है, हिन्दुस्तानी भाषा की इस पुस्तक में देवनागरी के साथ अरबी-फारसी शब्दों का भी बहुतायत प्रयोग है। ‘हिन्दुस्तानी’ ज़बान की भाषा में मुख्यतः हिन्दी के साथ अन्य जबाने भी जुड़ी हुई थी।
हिन्दुस्तानी वह बोली है जो उत्तर हिन्दुस्तान के बहुत से शहरों, कस्बों और गाँव-गाँव में बोली जाती है। इसका नाम ‘हिन्दुस्तानी’ यूँ ही नहीं पड़ा, ‘हिन्दुस्तानी’ किसी जगह हिन्दुई, मुसलमानी, ईसाई या सिक्खी नाम से नहीं पुकारी जाती थी। हर जगह उसका नाम हिन्दुस्तानी था और इन्हीं सुर और स्वरों को मूल में रखकर ही हिन्दुस्तानी एकेडेमी की स्थापना की गयी।
आजादी के पूर्व सन् 1924-25 में ही एक ऐसी संस्था की आवश्यकता महसूस की जा रही थी जिसके माध्यम से आधुनिक भारतीय भाषाओं को सम्पन्न करने की दिशा में निश्चित कदम उठाया जा सके। एक ऐसी संस्था की जरूरत थी जो साहित्यर्ढन के कार्य को प्रोत्साहन दे, कला और विज्ञान के विभिन्न अंगो की पूर्ति के लिए बड़े और प्रमाणिक संकलन ग्रन्थ प्रस्तुत करे। ऐसी संस्था का प्रयास शासन के सहयोग और संरक्षण में किया जाये।
इसके लिए पहला निश्चित प्रस्ताव वाराणसी के स्व. यज्ञनारायण उपाध्याय ने 1925 में दिसम्बर में प्रान्तीय धारा सभा में रखा। उन्होंने कहा कि संस्था का उद्देश्य यह होना चाहिए कि प्रान्तीय भाषा में वह आधुनिक विज्ञान तथा ज्ञान के विविध अंगों पर उपयोगी पुस्तकों के अनुवाद उपलब्ध हों। इस प्रस्ताव को धारा सभा में स्वीकार किया।
अप्रैल, 1926 में स्व. हाफिज हिदायत हुसैन ने प्रान्तीय धारा सभा में एक और प्रस्ताव रखा जिसमें हिन्दी और उर्दू साहित्य की अभिवृद्धि के उद्देश्य से शासन से ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ नाम की एक संस्था की स्थापना के लिए कहा गया।
उस समय के माननीय शिक्षामंत्री राय राजेश्वर बली का लगाव भी संस्था के निर्माण में था, फलस्वरूप संयुक्त प्रान्तीय शासन द्वारा हिन्दुस्तानी एकेडेमी की स्थापना के विषय में एक निश्चित प्रस्ताव 22 जनवरी, 1927 के गज़ट (राजपत्र) में प्रकाशित किया गया।
इस तरह हिन्दुस्तानी एकेडेमी की स्थापना 29 मार्च, 1927 को लखनऊ में तत्कालीन प्रान्तीय गवर्नर सर विलियम मैरिस द्वारा हुई। इस अवसर पर शिक्षामंत्री श्री राय राजेश्वर बली ने बताया कि इस संस्था की स्थापना का दायित्व शासन का है, किन्तु शासन एकेडेमी के कार्यों तथा क्रियाओं पर नियंत्रण लगाने की इच्छुक नहीं हैं।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी का उद्देश्य प्रारम्भ से लेकर सन् 1957 तक हिन्दी और उर्दू साहित्य की रक्षावृद्धि रहा साथ ही भिन्न-भिन्न विषयों की उच्चकोटि की पुस्तकों पर पुरस्कार तथा दूसरी भाषाओं की पुस्तकों का अनुवाद कर प्रकाशित करना रहा, किन्तु आजादी के बाद इसमें परिस्थितिवश युगान्तकारी परिवर्तन हुए और फलस्वरूप जनतांत्रिक शासन और जनता, दोनों ओर से भाषा और साहित्य के संबंध में नीति-परिवर्तन का विचार उठने लगा। शासन तथा एकेडेमी को ध्यान में रखते हुए 1956 में शासन ने एकेडेमी के संशोधित रूप को प्रस्तुत किया। एकेडेमी की परिषद ने सोसाइटीज रजिस्टेªशन एक्ट 1860 के 21 की धारा 12 के अनुसार एकेडेमी के उद्देश्यों और लक्ष्यों को परिमार्जित किया। फलस्वरूप राज्य भाषा हिन्दी, उसके साहित्य तथा अन्य रूपों एवं शैलियों- जैसे- उर्दू, ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी आदि भाषाओं का परिरक्षण, संवर्धन और विकास जिनकी उन्नति से हिन्दी विकासवान हो सकती थी। मौलिक हिन्दी कृतियों, अन्य भारतीय भाषाओं तथा अनूदित कृतियों को प्रकाशित करने का प्रयास तथा साहित्यकारों के सम्मान एवं पुरस्कार देने की परम्परा के साथ अन्य कई उद्देश्यों को एकेडेमी से जोड़ा गया। साथ उत्कृष्ट कोटि के विद्वान एवं विशिष्ट साहित्यकारों द्वारा व्याख्यान मालाएँ कराने की नीति को एकेडेमी मे समाहित किया गया। जिससे इन व्याख्यानों को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जा सके।
 

हिन्दुस्तान की अधिसंख्य आबादी द्वारा हिन्दी व उर्दू भाषा बोली जाती थी। देश की आजादी में भी हिन्दी और उर्दू का अत्यधिक योगदान रहा है। हिन्दुस्तानी भाषा का तात्पर्य हिन्दी + उर्दू से है। इसी हिन्दुस्तानी के संरक्षण, संवर्द्धन के लिए हिन्दुस्तानी एकेडेमी की स्थापना 22 जनवरी 1927 में हुई। इसका उद्‍घाटन 29 मार्च 1927 को लखनऊ में तत्कालीन प्रान्तीय गवर्नर सर विलियम मॉरिस द्वारा किया गया। इसके गठन में तत्कालीन शिक्षा मंत्री मा. राय राजेश्वर बली, पं. यज्ञनारायण उपाध्याय, स्व. हाफिज हिदायत हुसैन, डा. तेज बहादुर सप्रू का प्रमुख योगदान था।

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