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हिन्दुस्तानी ऐकेड़मी, इलाहाबाद || Hindustani Academy

♦ ♦ ♦ ♦ ♦ ♦ निरन्तर चलने वाली योजनायें♦ ♦ ♦ ♦ ♦ ♦

निरन्तर चलने वाली कार्य योजनाएँ
1. क्षेत्रीय भाषाओं (भोजपुरी, अवधी, ब्रज, बुन्देली) के विकास एवं संवर्धन हेतु कार्ययोजनाएँ
भोजपुरी - हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ, उपभाषाओं में भोजपुरी का अन्यतम महत्व है। व्यापक क्षेत्र में बोलचाल का माध्यम तो वह है ही, लोकसाहित्य एवं शिष्ट साहित्य की उसकी अपनी समृद्ध परम्पराएँ है। कबीर आदि संत कवियों की रचनाओं तक में भोजपुरी के स्पष्ट प्रयोग दिखते हैं। आधुनिक साहित्य के विकास में भी भोजपुरी क्षेत्र के अनेक कवियों - लेखकों का अप्रतिम योगदान है। रचनात्मक हिन्दी भाषा के विकास में भी भोजपुरी का योगदान है। इसके अलावा भोजपुरी का अपना समृद्ध साहित्य है जिसमें सभी विधाओं में भोजपुरी की स्तरीय कृतियाँ उपलब्ध हैं। भोजपुरी साहित्य का संवर्धन हिन्दुस्तानी एकेडेमी की प्राथमिकता रही है।
 
भोजपुरी भाषा क्षेत्र में एकेडेमी की अब तक की उपलब्धियाँ
 
प्रकाशन - 1. भोजपुरी लोकगाथा (सत्यव्रत सिन्हा), 2. भोजपुरी लोक साहित्य सांस्कृतिक अध्ययन (डाॅ0 श्रीधर मिश्र)
कार्यक्रम - 1. डाॅ0 उदयनारायण तिवारी और भोजपुरी भाषा (व्याख्यानमाला) 2. बोलियाँ और हिन्दी (व्याख्यानमाला) 3. हिन्दी साहित्य के विकास में क्षेत्रीय बोलियों का अवदान (संगोष्ठी) 4. भोजपुरी, बुन्देली, ब्रजभाषा एवं अवधी के साहित्य एवं भाषा पर संगोष्ठी एवं रचनाकारों का काव्यपाठ। 
2. अवधी - अवधी उत्तर भारत में बोली जानें वाली पूर्वी हिन्दी शाखा की प्रमुख बोली है। ‘अवधी’शब्द से ऐसा बोध होता है कि अवध मात्र में बोली जाती है जबकि केवल अवध मात्र में सीमित नही है। यह एक ओर अवध के कुछ क्षेत्रों में नही बोली जाती, बल्कि यह अवध के बाहर - फतेहपुर, इलाहाबाद, जौनपुर और मिर्जापुर में बोली जाती है। अवध का संबंध प्राचीन नगरी अयोध्या से है। तुलसीदास ने भी अयोध्या के लिये अवध शब्द प्रयुक्त किया है। आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रन्थ अवधी का तुलसीदास कृत ‘रामचरित मानस’ है। अवधी का दूसरा महत्वपूर्ण ग्रन्थ मलिक मुहम्मद जायसी कृत ‘पद्मावत’ है। अवधी भाषा का संवर्धन एवं विकास नितान्त आवश्यक है। क्योंकि ‘अवधी’ प्रायः प्रयोग में निरन्तर पिछड़ रही है इसमें नित्य प्रति सृजनधर्मिता की पहल नितान्त आवश्यक है।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने अवधी भाषा के विकास के लिये जागरूक पहल की है -
प्रकाशन - 1. जायसी ग्रन्थावली - संपादक - माता प्रसाद गुप्त 2. अवधी कोश - रामाज्ञा द्विवेदी ‘समीर’ 3. तुलसी शब्द सागर - भोलानाथ तिवारी 4. अवधी का विकास - बाबूराम सक्सेना 5. घाघ और भड्डरी - संपादक - रामनरेश त्रिपाठी।
कार्यक्रम - 1. अवधी रचना पाठ - काव्य गोष्ठी  2. बोलियां और हिन्दी - संगोष्ठी 3. अवधी, ब्रज, बुन्देली एवं भोजपुरी पर व्याख्यान एवं काव्य संध्या  4. हिन्दी भाषा और उसकी बोलियों का अन्तः संबंध - संगोष्ठी
3. ब्रज- ब्रज शब्द का संस्कृत तत्सम रूप ‘व्रज’ है जो संस्कृत धातु ‘व्रज’ ‘जाना’ से बना है। मध्यकालीन हिन्दी साहित्य में तद्भव रूप ‘ब्रज’ अथवा बृज निश्चय ही मथुरा के चारों ओर के प्रदेश के अर्थ में मिलता है। 19 वीं शताब्दी से पहले हिन्दी साहित्य का इतिहास प्रधानतया ब्रज साहित्य का इतिहास है। हिन्दी साहित्य का मध्यकाल (1400 से 1800) दो उपकालों में विभक्त है - भक्तिकाल तथा रीतिकाल। 16 वीं शताब्दी से 18 वीं शताब्दी तक का हिन्दी साहित्य का इतिहास मुख्यतया ब्रज साहित्य का इतिहास है। जनकवि सूरदास और नन्ददास ने ब्रज मण्डल की स्थानीय बोली में गीत लिखे और गाये और इस प्रकार साधारण बोली को एक साहित्यिक भाषा के रूप में विकसित किया। ब्रजभाषा का साहित्य अत्यन्त समृद्ध है। हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने ब्रजभाषा को समृद्ध करने के लिए अनेक सार्थक प्रयास किये।
 
ब्रजभाषा क्षेत्र में एकेडेमी की अब तक की उपलब्धियाँ -
 
प्रकाशन - 1. ब्रजभाषा - डाॅ0 धीरेन्द्र वर्मा  2. मथुरा जिले की बोली - डाॅ0 चन्द्रभान रावत  3. कृषक जीवन संबंधी ब्रजभाषा शब्दावली (दो खण्डों में) - अम्बा प्रसाद सुमन
कार्यक्रम - 1. मध्ययुग में हिन्दी भाषा का विकास - संगोष्ठी 2. बोलियाँ और हिन्दी - संगोष्ठी  3. ब्रजभाषा, भोजपुरी, बुन्देली, अवधी के साहित्य एवं भाषा पर संगोष्ठी एवं रचनाकारों का काव्यपाठ 4. हिन्दी भाषा और बोलियों का अन्तः सम्बन्ध - संगोष्ठी
4. बुन्देली- बुन्देली एक विस्तृत क्षेत्र की लोकभाषा है। मूलतः बुन्देली साहित्य के काव्यात्मक भाषिक प्रयोगों को केन्द्र में रखकर इसे एक स्वतंत्र व्यावहारिक एवं साहित्यिक भाषा के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई है। सर जार्ज ग्रियर्सन ने अपने लिंग्विस्टिक सर्वे आव इंडिया में इसे ब्रजभाषा से मुक्त ही रखा है तथा इसको पश्चिमी हिन्दी की एक स्वतंत्र भाषा के रूप में स्वीकृति दी है। इसके बोलने वालों की संख्या करोड़ों से अधिक है। बुन्देलखण्ड में बोली जानी वाली भाषा बुन्देली अथवा बुन्देलखण्डी है। भाषा अथवा बोली जन-जीवन की अभिव्यक्ति का एकमात्र साधन होती है और क्षेत्र विशेष की पहचान भी। भाषा अथवा बोली का संवर्धन एवं विकास एक क्षेत्र विशेष का विकास है एक बोली का लुप्तप्राय होना क्षेत्र विशेष की पहचान का मिट जाना है। इन बोलियों की उन्नति के लिए हिन्दुस्तानी एकेडेमी निरन्तर प्रयासरत है।
 
बुन्देली भाषा क्षेत्र में एकेडेमी की अब तक की उपलब्धियां 
 
प्रकाशन - ‘हिन्दुस्तानी’ त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन हिन्दुस्तानी एकेडेमी से किया जाता है जिसमें ‘बुन्देली’ भाषा पर केन्द्रित अनेक उल्लेखनीय आलेखों का प्रकाशन किया गया है - 1.बुन्देल खण्ड का अज्ञात बारामासी काव्य - श्री नर्मदा प्रसाद गुप्त 2.बुन्देलखण्ड का दुर्लभ ग्रंथ भक्ति मनोहर - डाॅ0 ओमप्रकाश लाल श्रीवास्तव 3. बुंदेले हर बोलो के मुँह हमने सुनी कहानी थीं - डाॅ0 कृष्ण दत्त पालीवाल 4. बुन्देलखण्ड के लोकनृत्य - लक्ष्मी नारायण दुबे 5. बुन्देलखण्ड का सम्प्रदायमुक्त कृष्ण-काव्य - नर्मदा प्रसाद गुप्त 6. बुन्देली बोली: एक सर्वेक्षण - पूरनचंद श्रीवास्तव 7. बुन्देलखण्ड में चंदसखी के भजन और लोकगीत - शालिग्राम गुप्त 8. बुन्देलखण्ड की कुछ श्रेणियाँ - हरिहर प्रसाद गुप्त, इत्यादि ऐसे अनेक महत्वपूर्ण आलेखों का प्रकाशन किया गया है।
कार्यक्रम - 1. बोलियाँ और हिन्दी (व्याख्यान माला) 2. हिन्दी साहित्य के विकास में क्षेत्रीय बोलियों का योगदान (संगोष्ठी) 3. भोजपुरी, बुन्देली, ब्रजभाषा एवं अवधी साहित्य एवं भाषा पर संगोष्ठी और रचनाकारों का काव्य-पाठ 4. ‘बुन्देली का हिन्दी साहित्य में प्रदेय’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन।